संदेह से देखना तेरी आदत है, पर मेरी यारी भी देख..
खामियां मुझ में लाख सही, पर मेरी वफादारी भी देख..
यूँ न कर मुझे अलग खुद से , मेरी लाचारी भी देख..
ले झुकी तेरे कदमों में , तेरे आगे सब हारी भी देख..
मोहब्बत मे इम्तेहान वफादारियों का हो ,
आशिकों में हो ये बहस कि बेवफा कौन है...?
यह फैसला तो वक़्त भी शायद न कर सके ,
सच कौन बोलता है अदाकार कौन है.........?
ये मौसम भी कितना प्यारा है ,
करती ये हवायें कुछ इशारा है ,
ज़रा समझो इनके जज्बातों को,
किसी ने दिल से आपको पुकारा है ,
बेगानों से गुजर जाते है कोई बात नहीं होती।
हम उनसे रोज मिलते हैं मगर मुलाक़ात नहीं होती।
सूखे बंजर खेत जैसी जिंदगी बेहाल है...
घटाएं घिर तो आती है मगर बरसात नहीं होती।
कुछ तुम को सच से नफरत थी,
कुछ हम से न बोले झूट गए,
कुछ लोगों ने उकसाया तुम्हें,
कुछ अपने मुक़द्दर फूट गए,
कुछ खुद इतने चालाक न थे,
कुछ लोग भी हम को लूट गए,
कुछ उम्मीद भी हद से ज्यादा थे,
की मेरे ख्वाब ही सारे टूट गए....
तुम नफरतों के धरने,
क़यामत तक ज़ारी रखो।
मैं मोहब्बत से इस्तीफ़ा,
मरते दम तक नहीं दूंगी।
हम मेहमान नहीं,,,
रौनक-ऐ-महफ़िल हैं...,
मुद्दतों याद रखोगे के
जिंदगी में कोई आयी थी...!!!