Monday, 29 September 2014

      अये बदनाम गलियों...! 
ये तुम्हारी ही वहशत का नतीजा है... 

के मासूमियत खिड़की पे बैठ 
  खुद को जवां करती है..!


अलफ़ाज़ तो बहुत हैं..

      अलफ़ाज़ तो बहुत हैं,
मोहब्बत बयान करने के लिए। 

पर जो खामोशी नहीं समझ सके, 
   वो अलफ़ाज़ कया समझेंगे


"दीदार की 'तलब' हो तो

"दीदार की 'तलब' हो तो नज़रे जमाये रखना 'ग़ालिब' 

क्युकी, 'नकाब' हो या 'नसीब'...........सरकता जरुर है


किस्मत ने कैसी दी है मुझे

किस्मत ने कैसी दी है मुझे दगा ,

के करीब होकर भी तेरे करीब नही ..

चाहे लाख हो जाये दीदार तेरा ख्वाबो मे ,

मुझे तेरी परछायां भी नसीब नही..


Humhe Ab Arzoo Hi Nahi Uss Gulab Ki, 

Jo Khushboo Se zaida Zakham De.


ये बारीश, ये ठंडी हवा और ये खुशगवार मौसम... 

अगर मजबूर ना होते, तो तेरे पास होते....!!!


तेरे आने की आस पर जिंदा हूँ

तेरे आने की आस पर जिंदा हूँ अब तक, 
अब तुझे देखने की हसरत के सिवा कुछ नहीं.

तस्वीर तेरी आँखों में उतर गयी इस तरह, 
नज़र कहीं भी जाये तेरी सूरत के सिवा कुछ नहीं.

सुबह से शाम तक तेरी राह ताकता हूँ, 
अब मेरे पास तेरी यादों के सिवा कुछ नहीं.